Tuesday, May 21, 2013

डूबी-डूबी आँखों में सपनों के साए:खुशबु

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शरतचंद्र चटोपाध्याय शायद इसीलिए फ़िल्मकारों के पसंदीदा रहे है कि उनके उपन्यासों को पढने वाला प्यार से उपजी दर्द की तीव्रता को भी मखमली एहसास से ओढ लेता है।उनकी लेखनी ऐसी मानो कलम को प्यार की दवात में डुबो-डुबो कर कागज पर उकेरा गया हो..
और गुलजार साहब इन शब्दो पर मानो बरक लगा कर कह देते है..डूबी-डूबी आँखों में सपनों के साए,रात भर अपने हैं दिन में पराए कैसे नैनों में निंदिया समाए...
गुलजार सन १९७५ में आंधी,मौसम के साथ एक फ़िल्म खुशबु लेकर आए जिसमें एक नारी के आत्म-सम्मान को उन्होने अपने ही कोमल अंदाज में बहुत ही सम्मान जनक तरीके से प्रस्तुत किया।शरत चंद्र के उपन्यास पंडितमसाई पर आधारित ये फ़िल्म जिसमें एक गांव में दो बच्चे कुसुम और बृंदाबन साथ खेलते बडे होते है,दोनो के परिवार वाले उनकी शादी तय करते है,चुंकि साथ-साथ रहते है तो दोनो में असीम स्नेह हो जाता है।छुटपन में कुसुम अपने हाथ पर बृंदाबन का नाम भी गुदवाती है बृंदाबन को पढाई के लिए शहर भेज दिया जाता है।उम्र वक्त के साथ भागती है और जवान हो जाती है लेकिन दोनो के परिवार में कुछ ऐसा विवाद जन्म लेता है कि बृंदाबन के पिता कुसुम(हेमा मालिनी) को स्वीकार करने से मना कर देते है और बृंदाबन(जितेन्द्र) को शहर भेज देते है।आहत कुसुम गुदे हाथ पर बृंदाबन का नाम जला देती है लेकिन हाथ पर नाम मिटा देने से दिल पर लिखा नाम मिटाना कुसुम के लिए बहुत नामुमकिन था और वो शादी ना करने का फ़ैसला कर लेती है।विभिन्न घटनाक्रमो से कहानी गुजरती है बृंदाबन डाक्टर बनता है और परिस्थिति वश वो लाखी(शर्मिला टैगोर)से शादी कर लेता है लेकिन एक बच्चा होने के बाद लाखी गुजर जाती है। बृंदाबन अपने बच्चे चरण के साथ गांव आकर बस जाता है।गांव में प्लेग की महामारी फ़ैल जाती है बृंदाबन रात दिन गांव के लोगो की जान बचाने की भरसक कोशिश करता है काफ़ी लोग गांव छोड कर चले जाते है और कई लोगो की जान चली जाती है।कई कलाकार ऐसे होते है जो छोटे से रोल से बहुत गहरा प्रभाव छोड जाते है और कुसुम की सहेली मन्नो के किरदार में फ़रीदा जलाल ने अपनी भुमिका से अत्यधिक प्रभावित किया वही असरानी ने कुसुम के भाई के रुप में अपनी प्रतिभा के एक नए पहलु से परिचित कराया।कुसुम और बृंदाबन का फ़िर आमना सामना होता है,कुसुम के पुलकित मन के आवेग की स्थिति ऐसी कि स्वाभिमान से भरे घडे में भावॊं की बुंदो को बिना छलकाएं संतुलित भाव से सामना करना और ऐसा करना कितना कठिन होता होगा जब मन सागर की भांति हिलोरे ले रहा हो लेकिन किनारो को पता भी ना चले।बृंदाबन को अपनी मां से अतित के घटनाक्रमो का पता चलता है और उसके दिल में कुसुम के प्रति प्रेम के भावो का संचरण होने लगता है।हेमा मालिनी ने अपने संतुलित अभिनय से कुसुम को पुरी तरह जिया है और अपने आत्मसम्मान को बहुत ही संयमित भाव से स्थापित भी किया है।बृंदाबन और कुसुम का मिलाप होता है या नहीं ये तो फ़िल्म देखने पर ही पता लग सकता है।लेकिन
इस फ़िल्म से पंचम और गुलजार की एकरुपता का पता चलता है।फ़िल्म में कुल चार गाने है और इन चार गानो में पंचम ने गुलजार के शब्दॊं को ऐसा खुबसुरत गुंथा है कि जब ये गाने हवाओं में गुंजते है ऐसा लगता है ये कानों में नहीं पुरे शरीर से टकरा रहे हो और पोरो में घुस कर भीना-भीना अहसास देकर लम्बे समय के लिए छोड देते है।पंचम ने ओ माझी रे...गाने को एक अलग ही तकनीक से संवारा है जिसमें उन्होने बंगाली लोक संगीत को एक नए प्रयोग के साथ ढाला जिसमें उन्होने आधी पानी से भरी बोतल में फ़ुंक के जरिये एक नया साउंड तैयार किया ज्यादातर सुनने वालो को ये एक दम क्लिक नहीं होता है लेकिन अगर आप ध्यान से सुनेगें तो आपको इंटरल्युड में तबले पर वाटर इफ़ेक्ट के तुरंत एक हुक आता है जो "पुक" की ध्वनि देता है और ये कमाल सिर्फ़ पंचम ही कर सकते है।ऐसा ही एक और कमाल आशाजी ने "घर जाएगी तर जाएगी" गाने में किया अंतरे में आशा जी के उछलते फ़ुदकते सुरों उतार चढाव को सुनना वाकई किसी रोमांच से कम नहीं-तेरे वास्ते, लाखों रास्ते, तू जहाँ भी चले, मेरे लिये बस तेरी ही राहें, तू जो साथ ले......
विभिन्न खुशबुओं से सारोबर फ़िल्म को फ़िल्म सिनेमा के इतिहास में एक क्लासिक फ़िल्म के तौर रखा जा सकता है।

विशेष:इस फ़िल्म में ट्रेजिक सीन पर आशीष खान ने सरोद पर बेक ग्राउंड स्कोर बहुत ही उम्दा ढंग से प्रस्तुत किया है।
फ़िल्म:खुशबु(8 मई 1975)
निर्माता:प्रसन कपुर
निर्देशक एवं गीतकार:गुलजार
लेखक:शरतचंद्र चटोपाध्याय
संगीतकार: आर.डी.बर्मन
गीत:
१.दो नैनो में आंसु भरे है....लता मंगेशकर
२.बेचारा दिल क्या करे-आशा भोंसले
३.घर जाएगी तर जाएगी-आशा भोंसले
४. ओ मांझी रे...किशोर कुमार
-yogendra vyas

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