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इस रविवार रुपहला सफ़र :
कालापत्थर-मजदुरों के पसीने से पिघला काला सोना
कालापत्थर गरीब मजदुरों के पसीने से पिघल कर बाहर आता है,ये पत्थर बरसॊ से दफ़न अपनी आजदी का जश्न मनाता है,मगर उसे नहीं पता कि अब उसे दलालो की काली करतुत उसे बदनाम कर देने वाली है,उसे नही पता कि उसे सफ़ेद कगजो में ढोय़ा जाने वाला है,उसे नहीं पता कि उसे सफ़ेदपोश कुर्तो के पीछे छिपा दिया जाने वाला है,उसे नहीं पता कि वो गरीबों की सिगडी में जलेगा,कारखानो की भट्टी में जलेगा या सियासती तिजोरी में दफ़न होगा।जब भी सफ़ेद पोश लोगो की आत्मा को खुरचा जाएगा ये कालिख के रुप में साफ़ नजर आएगा और गरीब मजदुरो की आत्मा को खुरचेगें तो ये अंदर से धधकते लावे के रुप में ही बाहर आएगा।
कोयले की खदानो में जीवन और मौत का एक ऐसा खेल जहां जिंदगियां अंधेरे में संघर्ष करती नजर आएगी और मुंह चिढाते उजाले में बाहर दलाल कालिख लगे हाथ धोते नजर आएंगे।
27 दिसंबर'75 बिहार चसनाला की वो कोयला खदान जहां 572 मजदुर खदान में पानी भर जाने की वजह से बुरी तरह फ़ंस गए थे। कालापत्थर फ़िल्म उसी असल घटना से प्रेरित है। विजय(अमिताभ बच्चन) एक ऐसा इंसान है जो अपने आप से भाग रहा है और उजाले से दुर कोयला खदान के अंदर अंधेरे में अपने अतित से लड रहा है।वो मर्चेंट नेवी में जहाज का केप्टन रहा है लेकिन एक रात जहाज तुफ़ान में घिर जाने से तीन सौ यात्रियों से भरे जहाज को मंझदार में छॊड कर अपने साथियों के साथ भाग जाता है।उसका कोर्ट मार्शल कर दिया जाता है।ग्लानि उसकी आत्मा पर बदनुमा दाग छोड देती है।इसी के चलते खामोशी से अपने दिल में धधकती आत्म ग्लानि की ज्वाला को रात दिन महसुस करता है और दिन रात मजदुरॊ की जिंदगी कॊ हर संभव बचाने की कोशिश करता है।वही खदान की डाक्टर सुधा(राखी गुलजार) उस खामोश धधकते लावे को अपने प्यार के मरहम से शांत करने की कोशिश करती है।इसी कडी में खदान मालिक धनराज(प्रेम चोपडा) जो कि मजदुरो की जान की कीमत पर जोखिम भरी ट्नेल से भी कोयला निकाल कर मुनाफ़ा कमाना चाहता है जहां उसे और ज्यादा खोदने पर खदान के अंदर पानी भरने का खतरा है लेकिन खदान इंजिनियर रवि (शशिकपुर) इस जोखिम को टालने की कोशिश करता है लेकिन लालच के आगे सच्चाई हारने लगती है और वो अनहोनी हो ही जाती है जिसमें खदान के कई सौ मजदुर खदान के अंदर बाढ से फ़ंस जाते है।यह सीन देखते समय उस भयावहता का एहसास होने लगता है कि मजदुर अपने व परिवार का पेट भरने के लिए के लिए बिना सुरक्षा कवच के किन-किन परिस्थितियो में काम करते है देख कर कलेजा मुंह को आता है। एक और पात्र मंगल (शत्रुध्नसिन्हा) जो कि जेल से भागा हुआ उम्र कैदी है जो वही कोयला खदान में आकर दादागीरी से मजदुरी करने लगता,विजय और मंगल की कई जगहो पर ठन जाती है और यही ठना-ठनी उसी समय से अमिताभ और शत्रुध्नसिन्हा में जारी है।लेकिन कहानी में विजय मंगल की जान बचा लेता है और खदान की दुर्घटना में वो भी मजदुरो की जान बचाने विजय के साथ खदान में उतर जाता है और मजदुरॊ की जान बचाते हुए जान दे देता है।विजय और रवि अधिकतर मजदुरो की जान बचाने में कामयाब होते है।हालांकि बाक्स आफ़िस पर ये फ़िल्म कोई कमाल नहीं कर सकी लेकिन यश चोपडा ने बहुत ही मेहनत के साथ खदान दुर्घटना का फ़िल्मांकन किया जो अंत तक देखने वालो की सांसे रोके रखता है।राजेश रोशन का संगीत और सलील चौधरी का बेक ग्राउंड स्कोर जरुर कुछ रौनक पैदा करता है लेकिन विषय वस्तु के नाते गाने दृश्यो में फ़िट नही हो सके लेकिन इन गानो का आडियो सुने तो कुछ गाने कमाल करते है मसलन कोरस गाना धुम मचे धुम और एक रास्ता है जिंदगी...जहां साहिर सा.ने अपने शब्दॊ को बिल्कुल भी जाया नहीं किया है बल्कि जिया है। इस फ़िल्म को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि यश चोपडा सिर्फ़ रोमांस ही नहीं बल्कि यथार्थ परक फ़िल्म बनाने में भी माहिर थे।
खदानो के उपर शतरंज की बिसाते बिछी हुयी है जिसमें सभी गोटियां बिकी हुयी है।बस नुकसान उन बेचारी मजदुरॊ की औरतो का है जो चुडिया तो खरीदती है लेकिन पहनने के लिए कम तोडने के लिए ज्यादा।
विशेष:सलीम-जावेद की पटकथाओं से जन्मे एग्री य़ंग मेन अमिताभ का किरदार इस फ़िल्म में ज्यादा उभरा लगता है जहां वे संवाद कम और आंखो के जरिये ज्यादा बात कहते है।
फ़िल्म:
काला पत्थर(24 अगस्त 1979 )
निर्माता-निर्देशक-यश चोपडा
लेखक -सलीम-जावेद
संगीत-राजेश रोशन
गीत-साहिर लुधियानवी
गीत:
1. एक रास्ता है जिंदगी-किशोर कुमार,लता मंगेशकर
2. बाहों में तेरी -मो.रफ़ी,लता मंगेशकर
3. मेरी दुरों से आई बारात-लता मंगेशकर
4. जगिया जगिया-महेन्द्र कपुर,एस.के. मोहन,पामेला चोपडा
5. धुम मचे धुम-मो.रफ़ी,लता मंगेशकर,महेन्द्र कपुर,एस.के. मोहन
6. मुझे प्यार का तोहफ़ा देकर-मो.रफ़ी,उषा मंगेशकर
yogendra vyas
9425061538
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