Monday, June 3, 2013

व्यंग्य-सुब्बाराव कट ( व्यंग्य)

सुब्बाराव कट
बहुत खुशनुमा दिन था रविवार का- बहुत सारे पेडिंग काम कुछ खर्चे वाले तो कुछ सिर पर ओढे हुए ,शेष समय आराम के लिए तय था। इसके पहले कि पत्नि के कुछ और आदेश हो अपनी टु-व्हीलर की ओर लपका पर कहते है ना एक से बचा तो दुसरे पर अटका,पुरानी गाडी का सेल्फ़ स्टार्टर आचार व्यवहार में बिल्कुल पत्नि के माफ़िक ही है दस बार ..कर्र..कर्र...ना करे तो आगे ही नही बढ्ती...खैर पहुंचा केश-कर्तनालय,बहुत ही अप्रत्याशित स्वागत आ...आइए..आइए...भाई सा. बस दो कटिंग के बाद आपका नंबर लगाता हूं ...और सर कैसे है.....चाय बगैरह लेंगे....बहुत दिनो बाद आए...मैं भौंचक कि अचानक इतना सम्मान भाव तो पहले कभी नहीं था वरन पहले तो हिकारत का भाव भी उसके चेहरे पर आता था कि अरे भाई सा. आपके सपाट सिर पर बाल काटने में बहुत बोरिंग होती है कोई क्रियेटिविटी ही नहीं और मिलते है सिर्फ़ २० रु..। पर आज इतना प्रेम उमड घुमड कर बरस रहा था मैने सोचा चलो आज दिन अच्छा है .....मेरे गंजे सिर को भी गर्वोक्ति हुई कि चलो आज बाल वालो के बीच अपना सिर उपर उठ गया.... अब जैसे ही सर उपर उठाया तो सामने दिवार पर न्युज पेपर की कटिंग लगी थी और नीचे हाथ से लिखा था सुब्बाराव कट १५० रु.। संशय भाव से मैने पुछा भाई सा. ये क्या है,वो होंठ दबा कर हंसा बोला सर पेपर नहीं पडा क्या ...मैने कहा क्यो क्या तुमने उसमें रेट लिस्ट छपवाई है....वो बोला ऐसा ही समझ लिजिए अब आपकी कटिंग के १५० रु. लगेंगे,मैं बोला क्याssss....२० रू से १५० रु.........क्या मतलब...वो बोला मतलब ये कि सुब्बाराव जी भी अपने बाल कटाने के १५० रु. देते है ...मैने कहा कौन सुब्बाराव वो फ़िर हंसा ..अरे सर रिजर्व बैंक के गवर्नर...मैने कहा -अरे भाई..लेकिन उन्होने तो मजाक में कहा था,सर लेकिन उनके मजाक में कितना दम है..हम तो अब तक घाटे में ही काम कर रहे थे...हमारी युनियन ने भी अब आप जैसे "सरो" के रेट तय कर दिये है.ऐसा लगा जैसे मेरे चंद्राकार सिर के सारे बाल शर्मिंदगी से अपनी क्यारियों से बगले झांक रहे है और सामने बैठे बाल वाले भी समाचार पत्र के पीछे चेहरा छुपा कर हंसने का जतन कर रहे थे।मैं मन ही मन भुनभुनाया इन लोगो को तो पैसे की कमी है नहीं पहले तो गरीबो को ३२ रु में घर चलाने को कहत्ते है और ऐसा भी क्या मजाक कि आप किसी के गंजे सिर से खिलवाड करे.... अब क्या गंजा होना भी अभिशाप है.अब ज्यादा किरकिरी ना हो इसलिए धीरे से उसके कान में फ़ुसफ़ुसा कर पुछा भाई सा.घुट-मुंडी के कितने लोगे..वो आंखे तरेरकर बोला ३५ रु...तो ड्न कर दो।जैसे ही घुट-मुंडा सिर लेकर  कालोनी में घुसा चार-पांच लोगो की संशकित जिज्ञासा को शांत किया फ़िर घर में घुसा पत्नि चिल्लाई ये सफ़ाचट कहां से कराकर आ रहे हो शर्त हार कर आए हो क्या.....अब शर्त क्या जिंदगी ही हार की कगार पर खडी है....इन्फ़्लेशन और रिवर्स रेपो दर आम आदमी की हिफ़ाजत तो नहीं हां पुरी तरह हजामत पर जरुर आमादा है....वाकई जब सिर पर बाल ही ना बचे तो जिंदगी खुशनुमा कैसे हो सकती है......
-योगेन्द्र व्यास

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