क्योsss रे........ तु कहां थाssss...... (मां को सपर्पित)
सुबह की चादर को आगोश में लिये आज छुट्टी का दिन, चाय की प्याली होंठो तक पहुंची ही थी कि कुछ पहचानी हवाओं का सैलाब यादों पर सवार होकर टकटकी लगाये खडा हो गया."क्यो रे इतनी देर तु कहां था...." मां की दुलारी फ़टकार कानो से
छु-कर निकल गई,लेकिन साथ ही दबे पांव वही आवाज फ़िर सुनाई दी-आज ममता में घनता का ज्यादा आभास था,
स्वरो में उतावलापन ,आंखो की नमी स्वरों में उतर आई 'क्यो रे और कितनी देर करेगा'.
पहले भी झुठ बोलता था और कहता था अरे मां बस ऐसे ही कहीं चला गया था, लेकिन आज क्या कहुं-सच जो झुठ से
बडा है या झुठ जो सच में लिपटा हैं-'आऊगां मां?
आज इन हवाओं को क्या हो गया है -पुरब से ही बहने की ठान ली है, इन हवाओं में गजब का आभास व मिठास लगी-
जितनी यादें शायद मस्तिष्क में नही होगी इतनी यादो का पुलिंदा ट्च स्क्रीन लेकर खडी है-कह रही है हौले से छुलो मुझे,
हथेली से जरा स्पर्श ही हुआ था कि-एक अल्ह्ड बावला सा लडका तेजी से साइकिल तेडी मेडी गलियों में से भगाता लोगो की झिडकिया सुनता अलमस्त सा चला जा रहा था-हां शायद मैं ही था. आज एक्सीलेटर पर जमे पांव भी उतना मजा नही देते जितना साइकिल के पैडल.मोहल्ले का हल्ला,रेवडी वाले की आवाज,औटले पर बातों का तड्का-एक पल में इन हवाओं ने दिखा दिया. काss..श इन स्मृतियों को प्रोग्राम करके कोई साफ़्ट वेअर ढाल पाता....लेकिन कुछ काम जेहन में स्थित रुहानी तरंगे ही कर सकती है.फ़िर एक झौंका और पहचानी खुशबु-सिगडी पर उतरते गरमा गरम फ़ुलके, चावल की मीठी खुशबु, दाल का तड्का और ऊपर से मां की झिडकी-खाएगा नहीं तो पढेगा कैसे.... डांट का एक और फ़ुलका ....कढाई में चिपकी खुरचन के लिए बहन की तीखी चीमटी, उसकी ठुनकती शिकायत और साथ ही बाबा की सिफ़ारिश-बेटे छुटकी को दे दो.... और छुटकी मुंह चिढाती खुश, लेकिन अगले पल ही में मेरी और बढाती लै लो भैया थोडा तु भी लेले...और बस एक और सुरमयी शाम की शुरुआत.
ये हवायें है कि थमती ही नहीं- मेरे बाबा जितने अडिग थे मेरे अच्छे कालेज में दाखिले के लिए उतनी ही मां मेरे जाने पर बैचेन, मात्र सौ कि.मी. की दुरी पर ही तो जाना था ..लेकिन मां तो मां है, काफ़ी आश्वाशनो व नसीहतो के बाद मां राजी हुई और ये सौ कि.मी. की दुरी हजारो कि.मी. के फ़ासले पर बढ्ती गई....बढ्ती गई,.....फ़िर वही आवाज क्यो रे क....ब आएगा तु?
इन हवाओं पर ये आवाज फ़ासला तय करते..करते बोझिल हो चली थी.कितने सारे प्रश्न थे इन शब्दो में -'क्यो' अपने आप में प्रश्न है,'रे' एक ममत्व प्रश्न,'कब' फ़िर अपने आप में प्रश्न है,और 'आएगा?'(आएगा भी).
आजकल बाबा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता-वेतन से पेंशन तक बाबा ने कभी कमी नहीं होने दी.बहुत हौंसला दिया,जिद थी कि मेरा बेटा विदेश जाये,आज भी अपनी हम उम्र लोगो के बीच शान से तन कर बैठ्ते है लेकिन मां की टकटकी...क्यो रे आएगा भी तु?
हवाओं का सब्र टुट गया था-एक जोरदार थपेडा छु कर निकला कह रहा था सुन- पिता,भाई,बहन,दोस्त सभी व्यस्त है अपने में पिता अपने उम्र दराज सर्कल में,भाई अपने काम में, बहन अपने ससुराल में लेकिन मां अंत तक मां ही रहती है-उसका इंतजार किसी से उधार लिया नहीं होता है,उसकी नजर दरवाजे की हर उस आहट पर कि कोई संदेशा कोई खबर ताकि वह पुछ सके-क्यो रे कब आ रहा है तु?
आज इन थपेडो ने मन के बवंडर को फ़िर से छेड दिया है,जिन भावनाओ को मन के अंदर बडे ही नाजुक धागो से बमुश्कील सिल कर रखा था आज बेकाबू हो चली है 'क्या ये हवाएं आज पुरब की और जाएंगी नही जाएगी तो जाना पढेगा,हमने हमेशा हवाओं का रुख बदला है आज इन्हे जाना पडेगा, हमारे दिलो को टटोल कर ले जाना पडेगा इन्हे, ले जाना पडेगा हमारी भावनाओं का सैलाब कि-यहां के फ़ुलके नहीं है, सिर में कोई मालिश नहीं करता, कोई नहीं पुछ्ता-क्यो रे तु कहा था इतनी देर, यहां इंतेजार नहीं है मां-कोई टोकता नहीं , कोई विदाई पर रोता नहीं, यहां आंसुओ की कमी है मां, यहां दहलीजे नहीं है इसलिए पार करने मे कष्ट नहीं होता, वहां दहलीजे है मां उसकी ठोकरे रह-रहकर याद आती है. बस थोडा इंतेजार और-फ़िर तेरी गोद और मेरा सर.
मां चाहता हुं वहा सबके चेहरे खुश रहे, चाहता हुं वहां खुशियां बरकरार रहें, भाई की पढाई हो जाये, छुटकी की बात पक्की हो जाये , मकान बन जाए, जमा पूंजी लेकर बस आया.
ये हवाएं भी उतावली सी-बस पल में छु हो गई पुरब की और लेकिन एक ही पल में तुरंत हाजिर.अब इनमें शांत भाव था-काफ़ी ताजगी थी और इन पर तैरती आवाज-"अरे ठीक है रे चिंता मत कर आ जाना सविधा से और हां वहा ठंड होगी अदरक की चाय जरुर पीते रहना, क्यो रे बहु बच्चे कैसे है रे ठीक है ना? शायद मातृत्व के प्रश्न कभी खत्म नहीं होंगे और कभी होंगे भी नहीं.
आज एक नई स्फ़ुर्ति ताजगी इन हवाओ ने भर दी है अब कदम एक नये जोश व आशा के साथ उठ्ने लगे है.प्यार कभी कमजोर नहीं होता चाहे वह मां का हो या धरती मां का.
-योगेन्द्र व्यास (yvyas2010@gmail.com)
छु-कर निकल गई,लेकिन साथ ही दबे पांव वही आवाज फ़िर सुनाई दी-आज ममता में घनता का ज्यादा आभास था,
स्वरो में उतावलापन ,आंखो की नमी स्वरों में उतर आई 'क्यो रे और कितनी देर करेगा'.
पहले भी झुठ बोलता था और कहता था अरे मां बस ऐसे ही कहीं चला गया था, लेकिन आज क्या कहुं-सच जो झुठ से
बडा है या झुठ जो सच में लिपटा हैं-'आऊगां मां?
आज इन हवाओं को क्या हो गया है -पुरब से ही बहने की ठान ली है, इन हवाओं में गजब का आभास व मिठास लगी-
जितनी यादें शायद मस्तिष्क में नही होगी इतनी यादो का पुलिंदा ट्च स्क्रीन लेकर खडी है-कह रही है हौले से छुलो मुझे,
हथेली से जरा स्पर्श ही हुआ था कि-एक अल्ह्ड बावला सा लडका तेजी से साइकिल तेडी मेडी गलियों में से भगाता लोगो की झिडकिया सुनता अलमस्त सा चला जा रहा था-हां शायद मैं ही था. आज एक्सीलेटर पर जमे पांव भी उतना मजा नही देते जितना साइकिल के पैडल.मोहल्ले का हल्ला,रेवडी वाले की आवाज,औटले पर बातों का तड्का-एक पल में इन हवाओं ने दिखा दिया. काss..श इन स्मृतियों को प्रोग्राम करके कोई साफ़्ट वेअर ढाल पाता....लेकिन कुछ काम जेहन में स्थित रुहानी तरंगे ही कर सकती है.फ़िर एक झौंका और पहचानी खुशबु-सिगडी पर उतरते गरमा गरम फ़ुलके, चावल की मीठी खुशबु, दाल का तड्का और ऊपर से मां की झिडकी-खाएगा नहीं तो पढेगा कैसे.... डांट का एक और फ़ुलका ....कढाई में चिपकी खुरचन के लिए बहन की तीखी चीमटी, उसकी ठुनकती शिकायत और साथ ही बाबा की सिफ़ारिश-बेटे छुटकी को दे दो.... और छुटकी मुंह चिढाती खुश, लेकिन अगले पल ही में मेरी और बढाती लै लो भैया थोडा तु भी लेले...और बस एक और सुरमयी शाम की शुरुआत.
ये हवायें है कि थमती ही नहीं- मेरे बाबा जितने अडिग थे मेरे अच्छे कालेज में दाखिले के लिए उतनी ही मां मेरे जाने पर बैचेन, मात्र सौ कि.मी. की दुरी पर ही तो जाना था ..लेकिन मां तो मां है, काफ़ी आश्वाशनो व नसीहतो के बाद मां राजी हुई और ये सौ कि.मी. की दुरी हजारो कि.मी. के फ़ासले पर बढ्ती गई....बढ्ती गई,.....फ़िर वही आवाज क्यो रे क....ब आएगा तु?
इन हवाओं पर ये आवाज फ़ासला तय करते..करते बोझिल हो चली थी.कितने सारे प्रश्न थे इन शब्दो में -'क्यो' अपने आप में प्रश्न है,'रे' एक ममत्व प्रश्न,'कब' फ़िर अपने आप में प्रश्न है,और 'आएगा?'(आएगा भी).
आजकल बाबा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता-वेतन से पेंशन तक बाबा ने कभी कमी नहीं होने दी.बहुत हौंसला दिया,जिद थी कि मेरा बेटा विदेश जाये,आज भी अपनी हम उम्र लोगो के बीच शान से तन कर बैठ्ते है लेकिन मां की टकटकी...क्यो रे आएगा भी तु?
हवाओं का सब्र टुट गया था-एक जोरदार थपेडा छु कर निकला कह रहा था सुन- पिता,भाई,बहन,दोस्त सभी व्यस्त है अपने में पिता अपने उम्र दराज सर्कल में,भाई अपने काम में, बहन अपने ससुराल में लेकिन मां अंत तक मां ही रहती है-उसका इंतजार किसी से उधार लिया नहीं होता है,उसकी नजर दरवाजे की हर उस आहट पर कि कोई संदेशा कोई खबर ताकि वह पुछ सके-क्यो रे कब आ रहा है तु?
आज इन थपेडो ने मन के बवंडर को फ़िर से छेड दिया है,जिन भावनाओ को मन के अंदर बडे ही नाजुक धागो से बमुश्कील सिल कर रखा था आज बेकाबू हो चली है 'क्या ये हवाएं आज पुरब की और जाएंगी नही जाएगी तो जाना पढेगा,हमने हमेशा हवाओं का रुख बदला है आज इन्हे जाना पडेगा, हमारे दिलो को टटोल कर ले जाना पडेगा इन्हे, ले जाना पडेगा हमारी भावनाओं का सैलाब कि-यहां के फ़ुलके नहीं है, सिर में कोई मालिश नहीं करता, कोई नहीं पुछ्ता-क्यो रे तु कहा था इतनी देर, यहां इंतेजार नहीं है मां-कोई टोकता नहीं , कोई विदाई पर रोता नहीं, यहां आंसुओ की कमी है मां, यहां दहलीजे नहीं है इसलिए पार करने मे कष्ट नहीं होता, वहां दहलीजे है मां उसकी ठोकरे रह-रहकर याद आती है. बस थोडा इंतेजार और-फ़िर तेरी गोद और मेरा सर.
मां चाहता हुं वहा सबके चेहरे खुश रहे, चाहता हुं वहां खुशियां बरकरार रहें, भाई की पढाई हो जाये, छुटकी की बात पक्की हो जाये , मकान बन जाए, जमा पूंजी लेकर बस आया.
ये हवाएं भी उतावली सी-बस पल में छु हो गई पुरब की और लेकिन एक ही पल में तुरंत हाजिर.अब इनमें शांत भाव था-काफ़ी ताजगी थी और इन पर तैरती आवाज-"अरे ठीक है रे चिंता मत कर आ जाना सविधा से और हां वहा ठंड होगी अदरक की चाय जरुर पीते रहना, क्यो रे बहु बच्चे कैसे है रे ठीक है ना? शायद मातृत्व के प्रश्न कभी खत्म नहीं होंगे और कभी होंगे भी नहीं.
आज एक नई स्फ़ुर्ति ताजगी इन हवाओ ने भर दी है अब कदम एक नये जोश व आशा के साथ उठ्ने लगे है.प्यार कभी कमजोर नहीं होता चाहे वह मां का हो या धरती मां का.
-योगेन्द्र व्यास (yvyas2010@gmail.com)
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