Thursday, July 14, 2016

दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..


इंसान के अकेले पन की हुंक कभी पता नहीं लगती,चाहे कितनी ही थाह ले लो, तन का माधुर्य मन की उदासी को युं ही बयां नहीं करता उसके लिए गुलज़ार साहब की कलम से मन की लागी कुरेदना पड़ती है। कान्हा की बंसी की अपनी पीड़ा है, उसका सुर-माधुर्य कान्हा से अधर स्पर्श से खिल उठता है,लेकिन सुप्तकाल में उसके मन की वेदना सात मन के द्वारॊ में फ़िर से समा जाती है.गुलजार साहब ने बहुत खुबसुरती से बंसी(राधा) का मानवीकरण कर उस उचाट मनोदशा के भावॊं वर्णन कर एक-एक शब्द को मोती समान बना दिया है कि- "सातों बार बोले बंसी,एक ही बार बोले ना,तन की लागी सारी बोले,मन की लागी खोले ना"........गुलज़ार साहब कहते है- जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

राग देस पर आधारित ये मोहक गीत संगीत,गायकी,वाद्यो,एवं शब्दॊं के मिश्रण की अकल्पनीय मिसाल है,और ऐसे गीत बार बार नहीं बनते ।जिस तरह एक लेखक कल्पनाशीलता में शब्दों से खेलता है उसी तरह एक संगीतकार उस कल्पना के रेशे पकड़ कर सुमधुर शाल बना कर सुनने वाले के शरीर पर लपेटता चलता है। पंचम की महीन कारीगरी इस गाने की मधुरता को बयां करती चलती है।इस गाने में पं. रोनु मजुमदार ने अपनी फ़ुंक से बांसुरी के मानवीय करण को न सिर्फ़ जीवंत किया है बल्कि साए की तरह चुपके चुपके आशा जी आवाज का पीछा किया है.गाना सोलो ना लगते हुए लगता है ड्यूएट है,पुरे समय आशा जी के साथ बांसुरी भी गा रही है। पंचम ने गुलज़ार साहब की कल्पनाशीलता को अपने सारे वाद्यों में उड़ेल दिया है, गाने का आरंभ ही कुछ युं है कि बांसुरी कहीं एकांत में तालाब किनारे झिंगुर-बतख की आवाज़ के बीच अपनी तन्हाई की तान छेड़ती है वहीं संतुर मजबुती से उसका कंधा बन कर सहारा देता लगता है फ़िर तो क्या है आशा जी चिकोटी लेते हुए कह उठती है- चुपके सुर में भेद छुपाये, फूँक-फूँक बतलाये,तन की सीधी मन की घुन्नी,पच्चीस पेंचे खाए. पंचम का पसंदीदा वाद्य मादल और उसके प्रिय वादक कांचा, उन्होने उसे तबले के साथ बहुत ही खुबसुरती से प्रयोग किया है। पंचम ने हमेशा ही तबले का गैर पारंपरिक प्रयोग उम्दा ढंग से किया है और इस गाने में ज्यादातर दांए का प्रयोग और २ मिनट ४१ सेकंड पर तबले और बांसुरी की अदभुत जुगलबंदी कानो में रस घोल देती है.पंचम ने सरोद के कुछ टुकड़े प्रसिध्द सरोद वादिका श्रीमति ज़रीन दारुवाला(शर्मा) से बजवाएं है जो बेहद खुबसुरत बन पड़े है,संतुर,बांसुरी,मादल तबला,डफ़, सरोद.मार्कस,रेसो,गिटार और आशा जी की आवाज का जादु सुनना है तो इसे सिर्फ़ हेड फ़ोन पर सुना जाना चाहिए क्योकि ये सुर रस कानॊ के रास्ते सीधे दिल में उतरता है.पंचम-गुलज़ार-आशा जी की एक अनमोल गैर फ़िल्मी एलबम "दिल पडोसी है"जिसके सारे गाने एक अदभुत तिलिस्म पैदा करते है उन्ही में से एक "सातों बार बोले बंसी"

........ एक बारगी बस सुनिए तो सही सिर्फ़ ५ मिनट ७ सेकण्ड ......


-"य़ॊगी"योगेन्द्र

https://www.youtube.com/watch?v=TSd79hEluI4

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