Thursday, January 12, 2017

कम नहीं है रौशनी.. हर शै में तेरा नूर है………..

ऐ ख़ुदा हर फ़ैसला......किशोर दा के इस गाने को सुनकर लगता है जैसे रेगिस्तान की हवाओं की खराशें उनके गले से बह रही है, आवाज में इबादत का अदब और गम की इंतेहा पाक साफ़ सुनाई देती है और इस पे पंचम की अज़ान इसे दुगनी ताकत के साथ उपर की और उछाल देती है कि शायद ख़ुदा सुन ले तभी तो आनंद बक्षी अपनी कलम से ये कहते है "इस ज़मी से आसमां शायद बहुत ही दुर है"।
अब्दुल्ला फ़िल्म का संगीत पंचम के श्रेष्ठ्तम संगीत में से एक है। इस गाने में पंचम ने अरेबियन टच के साथ हिंदुस्तानी संगीत को बखुबी गुंथा है। सेक्साफोंन मेंडोलिन, रुआब, एकास्टिक्स गिटार,बेस गिटार बांसुरी के साथ साथ चाइम्स ,मारकस, और अन्य पर्कशन्स का खुबसुरती से इस्तेमाल किया है। पंचम दा के इंटरल्यूड और प्रिल्युड सेन्स के प्रमुख सेंसर मनोहारी दा का सेक्साफोंन और कांचा भाई का मादल इफेक्ट हमारे कानो को ये तहज़ीब सीखा जाता है कि एक अच्छा संगीत कैसे सुना जाए जो कानो से उतरकर सीधे दिल में धंस जाए । इस गाने को हॆड्फ़ोन पर सुनना एक अलहदा एहसास है, पर्कशन्स को मुख्य वाद्य के रुप में सुनना और स्ट्रिंग का अदभुत प्रयोग सुनने काबिल है। साथ ही टिक टिक की वाइब्रेशन ऐसी लगती है मानो ब्रम्हांड में कोई समय को अपने अंदाज में बजा रहा हो। वैसे तो ये गाना कई बार सुना लेकिन इस बार गुना फ़िर सुना और लगा कि हर इंस्ट्रूमेंट एक मनके के बराबर है जो पंचम के एहसास से गुंथा हुआ है कि जीतनी बार (फेरो) सुनो पंचम के प्रति मन अगाध श्रद्धा से भर जाता है। 4 मिनट 29 सेकंड में ये रुहानी यात्रा कर लेनी चाहिए।
-"योगी" योगेंद्र

No comments:

Post a Comment

https://www.facebook.com/sunil.joshi.10888/videos/2237571532949932/