http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=7894&boxid=1844734
संसार में मनुष्य ही एक ऐसा बुध्दिजीवी प्राणी है जो अपने मन और शरीर दोनो से सतत संघर्षशील रहता है।जबकि पशु प्रकृति द्वारा प्रद्त्त समस्त नैमतो को जस का तस स्वीकार करता है।वो ना भोगी है ना योगी है ना विलासी है ना तपस्वी,ना पापी है ना पुण्यात्मा जो है वो ही है कभी ईश्वर को पाने की कोशिश नहीं करता।लेकिन मनुष्य अपनी बुध्दि और विवेक के जाल में उलझा वो भटका हुआ प्राणी है जो इस भ्रम में है कि वो जप-तप,त्याग से बाहरी एवं आंतरिक वासनाओं पर काबु पा लेगा और ईश्वर के सामने एक अच्छे विद्यार्थी होने का स्वांग भर लेगा......ऐसे में ईश्वर के पास सिर्फ़ मुस्कराने के अलावा और क्या चारा होगा।
भारतीय फ़िल्म इतिहास के सौ वर्ष पुरे होने जा रहे है और चित्रलेखा फ़िल्म का जिक्र ना हो तो शायद उस विषय के प्रति न्याय नहीं होगा जिसे निर्देशक केदार शर्मा ने सन १९४१ एवं १९६४ में चलचित्र पर उतारने का साहस किया। भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा पर फ़िल्म बनाना वाकई चुनौती पुर्ण कार्य था और कुछ हद तक वे सफ़ल भी हुए।ये फ़िल्म पाप-पुण्य,योगी-भोगी,ब्रम्हचर्य-वासना,प्रेम-समर्पण,त्याग-चेष्टा जैसे मुद्दो पर द्वंद पैदा करती आगे बढती जाती है।
चंद्रगुप्त मौर्य का दरबार लगा है जिसमें स्वयं राजा एवं सामंत बीजगुप्त(प्रदीप कुमार) राज नर्तकी का नृत्य देखने उपस्थित है।यदि राज दरबार में नृत्य प्रस्तुति होना है तो उसका संगीत भी उतना भावप्रवण और नृत्य भंगिमाए उच्चकोटी की होना तय है।काहे तरसाए जियरा.....राग कलावती में आशा भोंसले और ऊषामंगेशकर के गले की मुरकियों की कारीगरी और नृत्यांगनाओं के पैर की थिरकन सितार,तबले और पखावज कमाल का माहौल रचती है और ये ही लगता है काश की ये जियरा युंही तरसता रहे।राज नर्तकी चित्रलेखा(मीना कुमारी) पर सम्मोहित बीज गुप्त उसके प्रेमापाश में बंध जाते है और एक क्षत्रिय अपना राजधर्म एवं अपनी होने वाली पत्नि यशोधरा को भुलकर राज नर्तकी के साथ आमोद-प्रमोद में लीन हो जाता है।राजगुरु योगी कुमारगिरी अपने एक शिष्य श्वेतांक(मेहमुद) को सांसारिक जीवन के पापो का अध्ययन करने भेजते है लेकिन जिन आकर्षण से वो भागता है वो उन्हे उतने ही मजबुती से जकडते जाते है और वो उन्ही सांसारिक अवस्थाओं में खुद को पाता है।वहीं दुसरी और योगी ब्रम्हचारी कुमारगिरि चित्रलेखा को बीजगुप्त से पीछा छुडाने के लिए कडे शब्दॊं के साथ अपमान जनक भाषा में उसे पाप की जिंदगी से दुर जाने के लिए कहते है और ईश्वर की शरण में जाने के लिए कहते है यहां इन दोनो की बहस संवादो के रुप में सुनने लायक है-जिस तपस्या को धर्म समझ कर आप ईश्वर को खुश कर रहे है, तो मै अपने धर्म का पालन करने के लिए अपनी कला से दुनिया को खुश कर रही हुं यदि आप ये कहे कि मैं झुठ कह रही हो तो आप ज्ञानी नहीं और यदि आप मानते है कि मैं सच हुं तो मेरा दोष नहीं।लता जी आवाज में उम्दा गाना संसार से भागे फ़िरते हो.....ये पाप हैं क्या, ये पुण्य हैं क्या, रीतों पर धर्म की मुहरे हैं हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे।चित्रलेखा अपना प्रेम,ऐशो-आराम सब कुछ त्याग कर कुमारगिरी की शरण में चली जाती है लेकिन ये क्या स्त्री को अंधकार,मोह,माया और वासना मानने वाले कुमारगिरी खुद ही चित्रलेखा के मोहपाश में ध्वस्त होगए,सारी योग-तप-तपस्या वासना के धधकते लावे के उपर बैठ कर बरसो बरस की और अब एक याचक की भांति चित्रलेखा से गिढगिढा रहे है,यही इस फ़िल्म का मजबुत भाग है जिसे जरुर देखना चाहिए,ये देखना चाहिए कि एक तपस्वी अपनी सांसारिक वासनाओं को पुरजोर दबाकर ये समझता है कि उसने अपनी इच्छाओं पर विजय पा ली है तो ये उसकी गंभीर भुल है योगी की अवस्स्था तो ये है कि वासनाओं की उपस्स्थिति में मन की अवस्था विचलित ना हो यानि जब हम घर का कचरा बाहर फ़ेंक रहे होते है तो ये एक सहज प्रक्रिया के तहत करते है ये भाव नहीं रहता कि हम कचरा फ़ेंक रहे है और फ़िर उस पर चिंतन नहीं करते कि हमने वो कुढा फ़ेंक दिया है।जो फ़ेक दिया सो फ़ेंक दिया जो चिंतन करने लायक नहीं था।लेकिन आज के योगियों की स्थिति कुछ ऐसी ही है कि त्यागी रात दिन त्याग के बारे में सोचता रहता है और भीतर कचरा इकठ्ठा करता चला जाता है मन जब भी ईश्वर को याद करेगा पहले कचरे का ख्याल ही आएगा।इसीलिए एक योगी के भोगी बनने की संभावनाएं सदा मौजुद रहती है जबकि एक भोगी को योगी बनने में ज्यादा समय नहीं लगता।इसिलिए चित्रलेखा मुनिराज से ज्यादा उपलब्ध मालुम पडती है जब वो कहती है कि स्त्री अगर अंधकार है तो आंखे चौंधियां क्यो जाती है। इस फ़िल्म को भोगी और योगी दोनो के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए.इस फ़िल्म में संगीतकार रोशन का बेजोड संगीत और साहिर सा. के उम्दा गीत ना होते तो ये फ़िल्म बेजान होकर रह जाती है.साहिर साहब ने अपनी तन्हा जिंदगी के लम्हो को इन गीतो में पीरो दिया लगता है और रोशन साहब ने संगीत की उन उंचाईयों को छुआ है जहां सुनने वाले बस नीचे उतरना ही नहीं चाहेंगे.मन रे तु काहे ना धीर धरे...............
विशेष: यदि साहिर सा.के गीतो के साथ रोशन साहब संगीत सुन लिया तो समझिए एक दिन की इबादत मुकम्मल हुयी।
फ़िल्म:चित्रलेखा(1964 )
निर्माता:ए.के.नडियादवला
निर्देशक:केदार शर्मा
लेखक एवं संवाद:केदार शर्मा
मु्ल उपन्यास:भगवतीचरण वर्मा
संगीत: रोशन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
गीत:
1. ऐ री जाने ना दुंगी-लतामंगेशकर(राग कमोद)
2 छा गया बादल नील गगन पर-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले
3 काहे तरसाये जियरा-आशा भॊंसले,उषा मंगेशकर(राग कलावती)
4 मन रे तु काहे ना धीर धरे-मो.रफ़ी((राग कल्यान,यमन)
5 संसार से भागे फ़िरते हो-लतामंगेशकर(राग कल्यान,यमन)
6 सखी रे मेरा मन उलझे-लतामंगेशकर
7 मारा गया ब्रम्हचारी-मन्ना डे
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बहुत बढ़िया। कचरा फेंकने के दर्शन को चित्रलेखा फिल्म के योगी-भोगी दर्शन से जोड़कर सुन्दर संस्मरणात्मक आलेख तैयार हुआ है। बधाई। मेरे ब्लॉग स्पाट पर कदम रखने और प्रत्युत्तर देने का कष्ट करने के लिए धन्यवाद। आगे की शुभकामनाओं सहित।
ReplyDeleteविवेक जी बहुत बहुत धन्यवाद!
Deleteखुबसुरत अभिव्यक्ति
ReplyDeleteआकर्षित आलेख
हार्दिक धन्यवाद विभा जी ! प्रतिउत्तर में देरी के लिए अत्यंत क्षमाप्रार्थी हुं.
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