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दामुल: समाज का विकृत रुप
भारतीय समाज में शोषण की परम्परा सदियों से रही है जिसमें एक वर्ग विशेष अपने से कमजोर वर्ग पर अमानवीय ढंग से आर्थिक,मानसिक एवं दैहिक शोषण करता है जो कि आजतक विकसित हुए कथित सभ्य समाज में भी बदस्तुर जारी है।इन सामाजिक असमानताओं पर सौ सालो के भारतीय फ़िल्म इतिहास में कई फ़िल्म बन चुकी है और कई फ़िल्म आज भी बन रही है लेकिन ये फ़िल्में उसी तरह स्वीकृत होती है जैसे कोई प्रसिध्द पेंटर किसी रोते हुए आदिवासी की अर्धनग्न तस्वीर बना आर्ट गैलेरी में नुमाईश करता है और फ़िर बुध्दिजीवी वर्ग उस पर कई एंगल से उसकी बारिकियो पर चर्चा कर ड्राइंग रुम में सजाने के लिए भेज देता है। इसी के चलते व्यवसायिक सिनेमा के साथ समानांतर सिनेमा का उदय हुआ जिसे कुछ गिने चुने लोग एक सामाजिक समस्या से ज्यादा उसकी कलात्मकता पर ज्यादा तरजीह देते है और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार देकर अगले फ़िल्म महोत्सव का इंतेजार करते है।जिस पीडा और सच्चाई से फ़िल्म निर्देशक फ़िल्म बनाता है उस पर ना तो समाज और ना ही सरकारें गंभीरता से लेती है बस पुरस्कार देकर इतिश्री कर लेती है और बेचारे "दामुल"- जो मरते दम तक बंधुआ दासत्व में जीने को मजबुर किए जाते है उनकी अंतहीन कहानी चलती रहती है।
ऐसे ही निर्माता निर्देशक प्रकाश झा है जो लगातार अपनी फ़िल्मों के माध्यम से सामाजिक विकृतियों को अपने ही समाज के सामने लाते रहे है और समानांतर सिनेमा को व्यवसायिक सिनेमा से जोडने का श्रेय भी उन्हे ही जाता है कि उन्होने मनोरंजन के साथ उन सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन किया और दर्शको को सिनेमा हाल तक आने के लिए प्रेरित भी किया।
उनकी शुरुआती फ़िल्मों में से "दामुल" आज भी मन को झकझोर देती है।
बिहार के गया जिले का एक गांव जहां मुख्य रुप से ब्राम्हण और राजपुत अपने वर्चस्व की लडाई में दलितों का पुरजोर शोषण करते है और बंधुआ मजदुर के रुप में उन्हे अपने निज स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते है।संजीवन(अन्नुकपुर) जो कि दलित वर्ग से है और विभिन्न घटना क्रमों में उसे अपने पिता का कर्ज चुकाने के लिए उसके खेत से उसकी खडी फ़सल छीन ली जाती है,संजीवन गांव के मुखिया माधो(मनोहर सिंग) के पास सहायता मांगने जाता है लेकिन वो उसे मदद के नाम पर गांव के पशु चोरी करने के लिए मजबुर करता है और वो पशु अपने एजेंट के पास जमा करवाता है फ़िर उस व्यक्ति से फ़िरौती मांगी जाती है यदि वो फ़िरौती दे देता है तो पशु वापिस मिल जाते है और नहीं तो पंचायत में फ़ैसला होता है कि इस पशु को बेचकर जो पैसा आए वो बांट लिया जाए और पंचायत का खर्चा भी फ़रियादी ही भरता है।अब चोरी करवाने वाला ही पंच होतो न्याय की उम्मीद ही बेकार है।गांव में एक विधवा है महात्माईन(दिप्ती नवल) जिसका कि माधो मदद के नाम पर पुरजोर दैहिक शोषण करता है और उसकी खेती की सारी जमीन भी हडप लेता है।इधर चालबाज राजपुत मुखिया गांव के मजदुरो को काम दिलवाने के लिए पंजाब भेजने की कोशीश करता है लेकिन रास्ते में माधो का भाई उन गोलियां चला देता और उसमें काफ़ी मजदुर मारे जाते है।रातो रात माधो और राजपुत मुखिया एक हो जाते है और पुलिस के आगे मुंह ना खोलने के लिए गरीबॊ को धमकाते है।संजीवन सच बोलने की कोशिश करता है लेकिन उसे महात्माईन के बालात्कार और हत्या के मामले में झुठा फ़ंसा कर जेल भिजवां दिया जाता है और फ़िर अदालत उसे फ़ांसी की सजा सुना देती है।जैसे जैसे ये फ़िल्म देखते जाते है मन बहुत कसेला और द्रवित होता जाता है।लगता है इस धरा पर इतना नारकीय जीवन भी हो सकता है।फ़िल्म में यदि कलाकार खुद पात्र की आत्मा ओढ ले तो लगता है कि अभिनय का चरम क्या होता है इसके लिए अन्नुकपुर और सरीला मजुमदार बधाई व धन्यवाद के पात्र है । आज भी इस तरह के जुल्म अबोध और मेहनत कशो पर जारी है। समाज की वास्तविकता को समझने के लिए इस तरह की फ़िल्मो का अदालतो में संग्यान लिया जाना चाहिए कि आदालते ये भी समझ सके कि सबुतो और गवाहो को किस तरह से तोडा मरोडा जाता है और अत्याचारों की इंतेहा क्या होती है,एक बेगुनाह जिसने जीवन की अबोहवा तक महसुस नहीं की उसको फ़ांसी या जेल में सडने के लिए डाल दिया जाता है।
ये हमारे सिस्टम की विडंबना ही कहिए कि इसे सिर्फ़ एक फ़िल्म मानकर भुला दिया जाता है जबकि फ़िल्में समाज का ही प्रतिबिंब होती है।
मजदुर के शरीर से टपकी पसीने की बुंद अगर देश को खुशहाल बनाती है, तो वही- उसकी आंखो से निकले खुन के आंसु उस देश के अंधकार मय भविष्य की घोषणा भी करते है।
विशेष: इस फ़िल्म में विशेष यही है यदि जीवन में फ़िल्मी मनोरंजन जरुरी है तो जीवन में समाज की जमीनी हकीकत को समझना भी उतना ही जरुरी है।
फ़िल्म: दामुल (1985)
निर्माता एवं निर्देशक: प्रकाश झा
लेखक: शैवाल(कालसुत्र कथा)
संगीत:रघुनाथ सेठ
सिनेमेटोग्राफ़ी:राजेन कोठारी
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड -प्रकाश झा
नेशनल फ़िल्म अवार्ड1985:गोल्डन लोटस अवार्ड बेस्ट फ़िल्म
-योगेन्द्र व्यास
Sunday, April 28, 2013
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जैसे जैसे ये फ़िल्म देखते जाते है मन बहुत कसेला और द्रवित होता जाता है। लगता है इस धरा पर इतना नारकीय जीवन भी हो सकता है..........कितना संवेदित अनुभव है। मुझे भी ऐसा ही लगता है।
ReplyDeleteएक बेगुनाह जिसने जीवन की अबोहवा तक महसूस नहीं की उसको फ़ांसी या जेल में सड़ने के लिए डाल दिया जाता है.................कितनी विडंबनात्मक सच्चाई भारतीय धरा की। बहुत बढ़िया योगेन्द्र जी।
Dhanyawad Vikesh ji
Deleteमार्मिक
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